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हम राजपूताना विरासत के उत्सव के लिए भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

हमारे बारे में

अखंड राजपूताना सेवा संस्थान एक संस्था नहीं बल्कि एक विचार है। देश भर के सभी राजपूतों को एक सूत्र में बांधने का संकल्प लेते हुए एक संगठन बनाने का विचार समाज के कुछ प्रबुद्ध लोगों के मन में आया था। इस विचार को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक संस्था अखंड राजपूताना सेवा संस्थान का गठन ठाकुर केपी सिंह की अध्यक्षता में किया गया। संस्था का केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में है तथा दिल्ली से ही पंजीकृत (दिल्ली - (रजि.न.1765 /2017)) है। इसकी स्थानीय शाखा गाजियाबाद इंदिरापुरम में स्थापित की गई है।

अखंड राजपूताना सेवा संस्थान राष्ट्रीय स्तर की एक संस्था है। यह कोई एक संगठन नहीं बल्कि एक विचार है, जिसका ध्येय है **राजपूतों को एकजुट करना, एक मंच पर लाना**, उनकी **सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति** को बढ़ाते हुए राष्ट्र का निर्माण करना। अपने बच्चों को संस्कारवान बनाते हुए उनके युवा होने पर **योग्यता अनुसार युवक और युक्तियों को योग्य जीवन साथी तलाशने का मंच** देना। **क्षत्रिय समाज के महापुरुषों को सम्मान** देते हुए उनकी प्रतिमा सार्वजनिक स्थान पर स्थापित कराना।

हमारे विचारणीय विषय अनेक हैं, जिन्हें समयबद्ध तरीके से स्थापित किया जाएगा। फिलहाल कम शब्दों में यही कहना है कि संगठन का मूल मंत्र **क्षात्र धर्म का तेज समाज में प्रदीप्त रखना** है।

कृते,
राष्ट्रीय महासचिव
अखंड राजपूताना सेवा संस्थान (पंजीकृत) दिल्ली।

समस्त क्षत्रियों को ध्यान में रखने योग्य बातें!

1. अपने पूर्वजों का सम्मान करें तथा अपने बच्चों को पूर्वजों की कथाओं/गुणों से परिचित कराएं।

2. अपने-अपने घरों में महाभारत, रामायण एवं महापुरुषों से संबंधित गाथाओं आदि ग्रंथों को आवश्यक रखें एवं बच्चों को कभी-कभी उसका पाठ करने के लिए प्रेरित करें तथा उन्हें आप भी सुनें। क्षत्रिय महापुरुषों के चित्र भी रखें।

3. अपने बच्चों का नामकरण भी पूर्वजों के नाम के अनुरूप रखें तथा नाम के साथ क्षत्रिय की पहचान के लिए कुलों की उपाधियों को रखना न भूलें, जिससे यथायोग्य स्थायित्व धारण रहे। बच्चों में इससे क्षत्रिय गुणों का विकास होता है।

4. नाम भी ऐसा रखें जिससे बच्चे अपने आपको गौरवांवित महसूस करें। नैतिक शिक्षा एवं अनुशासन का भी पाठ बच्चों को पढ़ाएं और आचारशास्त्र बनाएं।

5. अपने वचन का पालन करें, अच्छे आदर्श स्थापित करें तथा उन्हें आवश्यक रूप से साथ-साथ दूसरों को भी प्रेरित करें।

6. बच्चों को शस्त्रों का उल्लेख मात्र ही न सिखाएं, बल्कि बड़े होने पर प्रयोग करना भी सिखाएं।

7. बच्चों को खेल-साथ-साथ खेलक्रीड़ा में भी पूरा आनंद दें तथा शारीरिक गठन की ओर विशेष ध्यान दें।

8. लड़कियों को भी शिक्षा में कोई कमी या कोताही नहीं बरतें तथा उन्हें हर तरह की शिक्षा के लिए प्रेरित करें।

9. अगर संभव हो तो दहेज रहित शादी करें/कराएं तथा आदर्श विवाह के प्रेरणास्त्रोत बनें।

10. क्षत्रिय/राजपूत कहने में गौरव का अनुभव करें। स्कूल/कॉलेज/घर/मकान/दुकान/मोहल्ला/मार्ग/संस्थान/प्रतिष्ठान आदि का नामकरण भी क्षत्रिय महापुरुषों के नाम पर करें।

11. बच्चों को हमेशा अपने परिवारजनों की साहसिक परंपरा से परिचित कराएं।

12. पारंपरिक परंपराओं एवं मर्यादाओं का पूर्णतः पालन करें।

13. क्षत्रियों को अन्य जातियों में लड़कियों का विवाह नहीं करना चाहिए।

14. इतिहास प्रसिद्ध महापुरुषों की जयंती समाजिक रूप से मनाएं।

15. जातीय जीवन को प्रेरणा देने वाले त्योहारों में सबसे महत्वपूर्ण है विजयादशमी का त्योहार। क्षत्रियों/राजपूतों के लिए इस पर्व का विशेष महत्व है। अतः इस पर्व को परंपरागत ढंग से सामाजिक रूप से मनाएं। इस अवसर पर पारंपरिक शस्त्रपूजन एवं रामलीला,प्रतियोगिता, अखाड़ा, सामाजिक भोज आदि का आयोजन चलाते रह सकते हैं।

16. सरकारी निर्देशानुसार घर पर ध्वज रखने की आवश्यकता रखी जाए एवं उसका प्रदर्शन समय-समय पर आवश्यक करते रहें, जिससे भावी पीढ़ी में आत्मगौरव बना रहे।

17. शादी-विवाह, मुंडन-संस्कार, सामाजिक आयोजनों में अपने पारंपरिक वेष-भूषा को आवश्यक धारण करें। हमारी पारंपरिक वेष-भूषा पगड़ी, शेरवानी, धोती, कुर्ता आदि तत्काल प्रभाव से अति-आवश्यक है। शादी-विवाह के अवसर पर घर पर ध्वजारोहण आवश्यक रूप से करें।

18. सेना, पुलिस सेवा में हों, सैन्य में या पुलिस में नौकरी करने वाले अनुशासन, ईमानदारी, कार्यक्षमता और सत्यनिष्ठा में अपनी जातीय गरिमा बनाकर रखें। अपने अधीनस्थों के सामने आदर्श प्रस्तुत करें, जो महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान जैसे शूरवीरों की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला हो। इससे हमारी जाति का गौरव बढ़ेगा और समाज में हमारी प्रतिष्ठा बनी रहेगी।

19. व्यवसाय के अतिरिक्त व्यवसाय में भी ईमानदारी से धर्मपरायण व्यवसाय करें। ठगने या धोखाधड़ी से व्यवसाय का ध्यान न करें।

20. दलित वर्ग में धार्मिक भावना और दीन असहायों पर विचारशील वर्ग की रक्षा का कार्य और सत्पथ की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। इसका अनुपालन करें।

21. इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि क्षत्रिय/राजपूत एक विकसित जाति और कौम हैं। हम सभी जातियों के लिए इसे कठोरता से नहीं भूलना चाहिए। आपके आचार-विचार से हमारा पूर्ण समाज, प्रदेश और राष्ट्र प्रभावित होता है।

"हमारा कर्तव्य है कि हम अपने गौरवशाली इतिहास को बनाए रखें और अपने समाज को सशक्त बनाएं!"

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